التحذير من الجرأة على تفسير القرآن دون تأهل لذلك

التفسير بالرأي حرام، والمسألة مفترضة في شخصين:

الأول: لا علاقة له بالقرآن، ولا بتفسيره، فلم يقرأ عن سلف هذه الأمة، ولا عن أئمتها فأعطيته آية أو سورة وقلت له: (فسرها)! هذا تفسيرٌ بالرأي.

والثاني: له عناية فائقة بالقرآن، وقرأ من التفاسير ما يؤهله لأن يرجّح بين الأقوال، وصار رأيه في فهم هذه الآية يختلف عن فهم ابن كثير وابن جرير الطبري والقرطبي وغيرهم من المفسرين، لكنه رأيٌ تحتمله العربية، والسياق يقتضيه، أو يدل عليه، نقول حينئذٍ: هذا منه تأويل جائز ولو لم يوجد له سلَف، لكن هذا الشخص له من العناية والدراية والدربة ما يؤهله لفهم النصوص في تفسير القرآن؛ وينطبق عليه حديث: «فرُبَّ مبلَّغٍ أوْعى من سامع» [البخاري (1741)، ومسلم (1679)].

ولا نقول مثل ما يقول بعض الكُتّاب: (القرآن باللغة العربية، والسلف رجال ونحن رجال، ونفهم مثل ما يفهمون)، بل نقول: هذا ليس بصحيح، ففرق بين من يفسر القرآن وهو لا علاقة ولا خبرة ولا دربة له فيه، ومن يفسره بناء على علم وخبرة ودربة.

وإذا كان أهل العلم يحتاطون في تفسير السنة وشرحها؛ فلأن يحتاطوا في تفسير القرآن من باب أولى؛ لأن الذي يفسر القرآن يدّعي أن هذا مراد الله من كلامه، فقد يكون قَوّله وحَمّله من المعنى ما لم يحتمل.

ولذا جاء الذم الشديد لمن قال في القرآن برأيه، وقد يتّجه الذم إلى من قال فيه برأيه ولو أصاب، كمن حكم بين اثنين بجهل فهو في النار، ولو أصاب الحكم.

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